ढोल-दमाऊ की थाप से गूंजा उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय, लोक संस्कृति की विरासत से जुड़ी नई पीढ़ी

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हल्द्वानी_ उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय का सीडीएस जनरल बिपिन रावत बहुउद्देशीय सभागार रविवार को पहाड़ की लोक संस्कृति और पारंपरिक वाद्यों की थाप से गूंज उठा। ‘अपनी धरोहर न्यास’ की ओर से आयोजित ढोल-दमाऊ कार्यशाला में कलाकारों ने लोकवाद्यों की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्ता से लोगों को रूबरू कराया।

कार्यक्रम का शुभारंभ ढोल-दमाऊ की पारंपरिक थाप, दीप प्रज्वलन और शगुन आखर के साथ हुआ। डॉ. सोहन लाल और उनकी टीम ने गणेश वंदना के साथ विभिन्न तालों और बोलों की प्रस्तुति देते हुए बताया कि ढोल-दमाऊ उत्तराखंड के पर्वों, अनुष्ठानों और लोक परंपराओं का अभिन्न हिस्सा रहे हैं।

कार्यक्रम का सबसे भावुक और आकर्षक पल तब रहा, जब आठ वर्षीय हितेश कुमार ने अपने दादा मोहन लाल के साथ ढोल-दमाऊ की प्रस्तुति में हिस्सा लिया।इस दृश्य ने यह संदेश दिया कि पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत केवल यादों में नहीं, बल्कि नई पीढ़ी के हाथों में भी सुरक्षित रह सकती है।

सुंदर दास और उनकी टीम ने हुड़के की प्रस्तुति देकर लोक संगीत की विविधता से परिचित कराया। वक्ताओं ने कहा कि संस्कृति तभी जीवित रहती है, जब उसकी परंपराएं अगली पीढ़ी तक पहुंचती हैं। यू-कॉस्ट के महानिदेशक प्रो. दुर्गेश पंत ने ऐसे आयोजनों को सांस्कृतिक चेतना को मजबूत करने वाला बताया।

विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नवीन चन्द्र लोहानी ने कलाकारों और आयोजकों का आभार जताते हुए कहा कि विश्वविद्यालय में लोक संगीत और संस्कृति को विभिन्न आयोजनों से जोड़ने का प्रयास जारी रहेगा। कार्यक्रम में विभिन्न सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थाओं को सम्मानित भी किया गया।

आयोजन में बड़ी संख्या में स्थानीय लोग, संस्कृति प्रेमी और लोक कला के प्रशंसक शामिल हुए। कार्यक्रम का संयोजन एवं संचालन प्रो. राकेश चन्द्र रयाल ने किया।

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