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केंद्र की बड़ी घोषणा – जननायक कर्पूरी ठाकुर को मिलेगा भारत रत्न

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बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न मिलेगा. उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न दिया जाएगा. सरकार ने यह घोषणा ऐसे समय की है जब बुधवार (24 जनवरी) को कर्पूरी ठाकुर की 100वीं जयंती है।

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कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न से सम्मानित किए जाने की मांग लंबे समय से उठ रही थी. मंगलवार (22 जनवरी) को जेडीयू नेता केसी त्यागी ने ठाकुर को भारत रत्न देने के साथ-साथ उनके नाम पर विश्वविद्यालय खोलने की मांग की थी।

क्या बोले पीएम मोदी?

मंगलवार को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
ने अपने आधिकारिक X हैंडल से कर्पूरी ठाकुर की एक तस्वीर साझा करते हुए पोस्ट में लिखा, ”मुझे खुशी है कि भारत सरकार ने सामाजिक न्याय के प्रतीक महान जननायक कर्पूरी ठाकुर जी को भारत रत्न से सम्मानित करने का निर्णय लिया है और वह भी ऐसे समय में जब हम उनकी जन्मशती मना रहे हैं. हाशिये पर पड़े लोगों के एक चैंपियन और समानता और सशक्तिकरण के एक दिग्गज में यह प्रतिष्ठित सम्मान उनके सतत प्रयासों का प्रमाण है।

पीएम मोदी ने लिखा, ”दलितों के उत्थान के लिए उनकी अटूट प्रतिबद्धता और उनके दूरदर्शी नेतृत्व ने भारत के सामाजिक-राजनीतिक ताने-बाने पर एक अमिट छाप छोड़ी है. यह पुरस्कार न केवल उनके उल्लेखनीय योगदान का सम्मान करता है बल्कि हमें एक अधिक न्यायपूर्ण और न्यायसंगत समाज बनाने के उनके मिशन को जारी रखने के लिए भी प्रेरित करता है।

बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने जताई खुशी


कर्पूरी ठाकुर को देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न दिए जाने की घोषणा पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने खुशी जताई है. उन्होंने केंद्र सरकार के इस फैसले को सही निर्णय बताया. सीएम नीतीश ने कहा कि स्वर्गीय कर्पूरी ठाकुर जी को उनकी 100वीं जयंती पर दिया जाने वाला ये सर्वोच्च सम्मान दलितों, वंचितों और उपेक्षित तबकों के बीच सकारात्मक भाव पैदा करेगा.
मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि वह हमेशा से कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने की मांग करते रहे हैं. जेडीयू की वर्षो पुरानी मांग पूरी हुई है।

जननायक कर्पूरी ठाकुर दो बार बने थे बिहार के सीएम


कर्पूरी ठाकुर को बिहार में जननायक के नाम से पुकारा जाता है. वह दो कुछ-कुछ समय के लिए बिहार के मुख्यमंत्री बने थे. मुख्यमंत्री के रूप में उनका पहला कार्यकाल दिसंबर 1970 से जून 1971 तक चला था और इसके बाद वह दिसंबर 1977 से अप्रैल 1979 तक सीएम पद पर रहे थे. पहली बार वह सोशलिस्ट पार्टी और भारतीय क्रांति दल की सरकार में सीएम बने थे और दूसरी बार जनता पार्टी की सरकार में मुख्यमंत्री बने थे।

स्वतंत्रता आंदोलन में हुए थे शामिल, जेल भी गए


कर्पूरी ठाकुर को बिहार में जननायक के नाम से पुकारा जाता है. वह दो कुछ-कुछ समय के लिए बिहार के मुख्यमंत्री बने थे. मुख्यमंत्री के रूप में उनका पहला कार्यकाल दिसंबर 1970 से जून 1971 तक चला था और इसके बाद वह दिसंबर 1977 से अप्रैल 1979 तक सीएम पद पर रहे थे. पहली बार वह सोशलिस्ट पार्टी और भारतीय क्रांति दल की सरकार में सीएम बने थे और दूसरी बार जनता पार्टी की सरकार में मुख्यमंत्री बने थे।


कर्पूरी ठाकुर का जन्म बिहार के समस्तीपुर जिले के पितौंझिया (अब कर्पूरी ग्राम) गांव में गोकुल ठाकुर और रामदुलारी देवी के घर में हुआ था. छात्र जीवन में वह राष्ट्रवादी विचारों से प्रभावित थे और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन में शामिल हो गए थे. उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल होने के लिए अपना स्नातक कॉलेज छोड़ दिया था. स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने के लिए उन्होंने 26 महीने जेल में बिताए थे।

कर्पूरी ठाकुर ने किया था 28 दिनों तक आमरण अनशन


कर्पूरी ठाकुर का जन्म बिहार के समस्तीपुर जिले के पितौंझिया (अब कर्पूरी ग्राम) गांव में गोकुल ठाकुर और रामदुलारी देवी के घर में हुआ था. छात्र जीवन में वह राष्ट्रवादी विचारों से प्रभावित थे और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन में शामिल हो गए थे. उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल होने के लिए अपना स्नातक कॉलेज छोड़ दिया था. स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने के लिए उन्होंने 26 महीने जेल में बिताए थे।

देश को अंग्रेजी हुकूमत से स्वतंत्रता मिलने के बाद कर्पूरी ठाकुर ने अपने गांव के स्कूल में एक शिक्षक के रूप में काम किया था. वह 1952 में सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के रूप में ताजपुर निर्वाचन क्षेत्र से बिहार विधानसभा के सदस्य बने थे. 1960 में केंद्र सरकार के कर्मचारियों की आम हड़ताल के दौरान उन्हें गिरफ्तार किया गया था. 1970 में  उन्होंने टेल्को मजदूरों के हितों को बढ़ावा देने के लिए 28 दिनों तक आमरण अनशन किया था।

बिहार में की थी पूर्ण शराबबंदी लागू


देश को अंग्रेजी हुकूमत से स्वतंत्रता मिलने के बाद कर्पूरी ठाकुर ने अपने गांव के स्कूल में एक शिक्षक के रूप में काम किया था. वह 1952 में सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के रूप में ताजपुर निर्वाचन क्षेत्र से बिहार विधानसभा के सदस्य बने थे. 1960 में केंद्र सरकार के कर्मचारियों की आम हड़ताल के दौरान उन्हें गिरफ्तार किया गया था. 1970 में  उन्होंने टेल्को मजदूरों के हितों को बढ़ावा देने के लिए 28 दिनों तक आमरण अनशन किया था।


कर्पूरी ठाकुर हिंदी भाषा के समर्थक थे और बिहार के शिक्षा मंत्री के रूप में उन्होंने मैट्रिक पाठ्यक्रम से अंग्रेजी को अनिवार्य विषय से हटा दिया था. 1970 में बिहार के पहले गैर-कांग्रेसी समाजवादी मुख्यमंत्री बनने से पहले उन्होंने बिहार के मंत्री और उपमुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया. उन्होंने बिहार में पूर्ण शराबबंदी भी लागू की थी. उनके शासनकाल के दौरान बिहार के पिछड़े इलाकों में उनके नाम पर कई स्कूल और कॉलेज स्थापित किए गए थे।

कर्पूरी ठाकुर जयप्रकाश नारायण के करीबी थे. देश में आपातकाल (1975-77) के दौरान उन्होंने और जनता पार्टी के अन्य प्रमुख नेताओं ने समाज के अहिंसक परिवर्तन के उद्देश्य से संपूर्ण क्रांति आंदोलन का नेतृत्व किया था. बिहार के कई नेता कर्पूरी ठाकुर को अपना आदर्श मानते हैं।

मंडल कमीशन लागू होने से पहले कर्पूरी ठाकुर बिहार की राजनीति में वहां तक पहुंचे जहां उनके जैसी पृष्ठभूमि से आने वाले व्यक्ति के लिए पहुँचना लगभग असंभव ही था. वे बिहार की राजनीति में ग़रीब गुरबों की सबसे बड़ी आवाज़ बन कर उभरे थे।

24 जनवरी, 1924 को समस्तीपुर के पितौंझिया (अब कर्पूरीग्राम) में जन्में कर्पूरी ठाकुर बिहार में एक बार उपमुख्यमंत्री, दो बार मुख्यमंत्री और दशकों तक विधायक और विरोधी दल के नेता रहे. 1952 की पहली विधानसभा में चुनाव जीतने के बाद वे बिहार विधानसभा का चुनाव कभी नहीं हारे।

अपने दो कार्यकाल में कुल मिलाकर ढाई साल के मुख्यमंत्रीत्व काल में उन्होंने जिस तरह की छाप बिहार के समाज पर छोड़ी है, वैसा दूसरा उदाहरण नहीं दिखता. ख़ास बात ये भी है कि वे बिहार के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री थे।

सामाजिक बदलावों की शुरुआत

1967 में पहली बार उपमुख्यमंत्री बनने पर उन्होंने अंग्रेजी की अनिवार्यता को खत्म किया. इसके चलते उनकी आलोचना भी ख़ूब हुई लेकिन हक़ीक़त ये है कि उन्होंने शिक्षा को आम लोगों तक पहुंचाया. इस दौर में अंग्रेजी में फेल मैट्रिक पास लोगों का मज़ाक ‘कर्पूरी डिविजन से पास हुए हैं’ कह कर उड़ाया जाता रहा।

इसी दौरान उन्हें शिक्षा मंत्री का पद भी मिला हुआ था और उनकी कोशिशों के चलते ही मिशनरी स्कूलों ने हिंदी में पढ़ाना शुरू किया और आर्थिक तौर पर ग़रीब बच्चों की स्कूल फी को माफ़ करने का काम भी उन्होंने किया था. वो देश के पहले मुख्यमंत्री थे, जिन्होंने अपने राज्य में मैट्रिक तक मुफ्त पढ़ाई की घोषणा की थी. उन्होंने राज्य में उर्दू को दूसरी राजकीय भाषा का दर्जा देने का काम किया।

1971 में मुख्यमंत्री बनने के बाद किसानों को बड़ी राहत देते हुए उन्होंने गैर लाभकारी जमीन पर मालगुजारी टैक्स को बंद कर दिया. बिहार के तब के मुख्यमंत्री सचिवालय की इमारत की लिफ्ट चतुर्थवर्गीय कर्मचारियों के लिए उपलब्ध नहीं थी, मुख्यमंत्री बनते ही उन्होंने चर्तुथवर्गीय कर्मचारी लिफ्ट का इस्तेमाल कर पाएं, ये सुनिश्चित किया।

आज की तारीख में भले ये मामूली क़दम दिखता हो लेकिन संदेशात्मक राजनीति में इसके मायने बहुत ज़्यादा थे. बिहार के पूर्व एमएलसी प्रेम कुमार मणि कहते हैं, “उस दौर में समाज में उन्हें कहीं अंतरजातीय विवाह की ख़बर मिलती तो उसमें वो पहुंच जाते थे. वो समाज में एक तरह का बदलाव चाहते थे, बिहार में जो आज दबे पिछड़ों को सत्ता में हिस्सेदारी मिली हुई है, उसकी भूमिका कर्पूरी ठाकुर ने बनाई थी।

1977 में मुख्यमंत्री बनने के बाद मुंगेरीलाल कमीशन लागू करके राज्य की नौकरियों आरक्षण लागू करने के चलते वो हमेशा के लिए सर्वणों के दुश्मन बन गए, लेकिन कर्पूरी ठाकुर समाज के दबे पिछड़ों के हितों के लिए काम करते रहे।

मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने राज्य के सभी विभागों में हिंदी में काम करने को अनिवार्य बना दिया था. इतना ही नहीं उन्होंने राज्य सरकार के कर्मचारियों के समान वेतन आयोग को राज्य में भी लागू करने का काम सबसे पहले किया था।

युवाओं को रोजगार देने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता इतनी थी कि एक कैंप आयोजित कर 9000 से ज़्यादा इंजीनियरों और डॉक्टरों को एक साथ नौकरी दे दी. इतने बड़े पैमाने पर एक साथ राज्य में इसके बाद आज तक इंजीनियर और डॉक्टर बहाल नहीं हुए।

दिन रात राजनीति में ग़रीब गुरबों की आवाज़ को बुलंद रखने की कोशिशों में जुटे कर्पूरी की साहित्य, कला एवं संस्कृति में काफी दिलचस्पी थी. प्रेम कुमार मणि याद करते हैं, “1980-81 की बात होगी, पटना में एक कांग्रेसी सांसद के पारिजात प्रकाशन की दुकान पर मैंने उन्हें हिस्ट्री ऑफ़ धर्मशास्त्र ख़रीदते खुद देखा था. छह खंड वाली किताब उस वक्त तीन-साढ़े तीन हज़ार रुपये की थी. वे पढ़ने का समय निकाल ही लेते थे।

सादगी और ईमानदारी भरा जीवन

राजनीति में इतना लंबा सफ़र बिताने के बाद जब वो मरे तो अपने परिवार को विरासत में देने के लिए एक मकान तक उनके नाम नहीं था. ना तो पटना में, ना ही अपने पैतृक घर में वो एक इंच जमीन जोड़ पाए. जब करोड़ो रूपयों के घोटाले में आए दिन नेताओं के नाम उछल रहे हों, कर्पूरी जैसे नेता भी हुए, विश्वास ही नहीं होता. उनकी ईमानदारी के कई किस्से जिनको आज भी बिहार में मिसाल की तौर पर कहा जाता है शिद्दत से याद किया जाता है।

उनसे जुड़े कुछ लोग बताते हैं कि कर्पूरी ठाकुर जब राज्य के मुख्यमंत्री थे तो उनके रिश्ते में उनके बहनोई उनके पास नौकरी के लिए गए और कहीं सिफारिश से नौकरी लगवाने के लिए कहा. उनकी बात सुनकर कर्पूरी ठाकुर गंभीर हो गए. उसके बाद अपनी जेब से पचास रुपये निकालकर उन्हें दिए और कहा, “जाइए, उस्तरा आदि खरीद लीजिए और अपना पुश्तैनी धंधा आरंभ कीजिए।

एक किस्सा उसी दौर का है कि उनके मुख्यमंत्री रहते, उनके गांव के कुछ दबंग सामंतों ने उनके पिता को अपमानित करने का काम किया. ख़बर फैली तो जिलाधिकारी गांव में कार्रवाई करने पहुंच गए, लेकिन कर्पूरी ठाकुर ने जिलाधिकारी को कार्रवाई करने से रोक दिया. उनका कहना था कि दबे पिछड़ों को अपमान तो गांव गांव में हो रहा है।

एक और उदाहरण है, कर्पूरी ठाकुर जब पहली बार उपमुख्यमंत्री बने या फिर मुख्यमंत्री बने तो अपने बेटे रामनाथ को खत लिखना नहीं भूले. इस ख़त में क्या था, इसके बारे में रामनाथ कहते हैं, “पत्र में तीन ही बातें लिखी होती थीं- तुम इससे प्रभावित नहीं होना. कोई लोभ लालच देगा, तो उस लोभ में मत आना. मेरी बदनामी होगी।

रामनाथ ठाकुर इन दिनों भले राजनीति में हों और पिता के नाम का फ़ायदा भी उन्हें मिला हो, लेकिन कर्पूरी ठाकुर ने अपने जीवन में उन्हें राजनीतिक तौर पर आगे बढ़ाने का काम नहीं किया. प्रभात प्रकाशन ने कर्पूरी ठाकुर पर ‘महान कर्मयोगी जननायक कर्पूरी ठाकुर’ नाम से दो खंडों की पुस्तक प्रकाशित की है. इसमें कर्पूरी ठाकुर पर कई दिलचस्प संस्मरण शामिल हैं।

उत्तर प्रदेश के कद्दावर नेता हेमवती नंदन बहुगुणा ने अपने संस्मरण में लिखा, “कर्पूरी ठाकुर की आर्थिक तंगी को देखते हुए देवीलाल ने पटना में अपने एक हरियाणवी मित्र से कहा था- कर्पूरीजी कभी आपसे पांच-दस हज़ार रुपये मांगें तो आप उन्हें दे देना, वह मेरे ऊपर आपका कर्ज रहेगा. बाद में देवीलाल ने अपने मित्र से कई बार पूछा- भई कर्पूरीजी ने कुछ मांगा. हर बार मित्र का जवाब होता- नहीं साहब, वे तो कुछ मांगते ही नहीं।

रामनाथ अपने पिता की सादगी का एक किस्सा बताते हैं, “जननायक 1952 में विधायक बन गए थे. एक प्रतिनिधिमंडल में जाने के लिए ऑस्ट्रिया जाना था. उनके पास कोट ही नहीं था. एक दोस्त से मांगना पड़ा. वहां से यूगोस्लाविया भी गए तो मार्शल टीटो ने देखा कि उनका कोट फटा हुआ है और उन्हें एक कोट भेंट किया।

प्रेम कुमार मणि कहते हैं कि कर्पूरी वास्तविकता में समाजवादी राजनीति के बड़े नेता रहे हैं, उनके नाम पर माल्यापर्ण करने वाले उनकी सादगी और ईमानदारी भरे रास्ते पर चलने का साहस नहीं कर पाऐंगे, इसलिए भी कर्पूरी जैसे नेताओं को याद रखा जाना ज़रूरी है।

कर्पूरी ठाकुर का निधन 64 साल की उम्र में 17 फरवरी, 1988 को दिल का दौरा पड़ने से हुआ था।

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