कहां जाएं बेजुबान_ 1 घंटे तक चिंघाड़ता रहा हाथियों का झुंड, लोको पायलट पर केस की तैयारी

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उत्तराखंड – लालकुआं/पंतनगर। जंगल से निकलकर पानी और भोजन की तलाश में रेलवे ट्रैक तक पहुंचे एक बेजुबान हाथी की जिंदगी बाघ एक्सप्रेस की टक्कर ने छीन ली। मंगलवार रात हल्दी रोड–छतरपुर रेलवे स्टेशन के बीच हुए इस दर्दनाक हादसे ने एक बार फिर वन्यजीवों की सुरक्षा और रेलवे ट्रैक पर उनकी आवाजाही को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हादसे के बाद वन विभाग ने ट्रेन के लोको पायलट एसके सुमन के खिलाफ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज करने की तैयारी शुरू कर दी है। साथ ही, यह भी जांच की जा रही है कि हादसे के समय ट्रेन निर्धारित गति सीमा के भीतर चल रही थी या नहीं।

सुबह हुआ पोस्टमार्टम

जानकारी के अनुसार, मंगलवार रात करीब 11 बजे लालकुआं से रुद्रपुर की ओर जा रही हावड़ा–काठगोदाम 13020 बाघ एक्सप्रेस हल्दी रोड–छतरपुर रेलखंड पर पिलर संख्या 55/8 के पास एक वयस्क नर हाथी से टकरा गई। टक्कर इतनी भीषण थी कि करीब 40 से 45 वर्ष उम्र के हाथी की मौके पर ही मौत हो गई। हादसे के बाद ट्रेन लगभग आधे घंटे तक घटनास्थल पर रुकी रही। इसके बाद लोको पायलट ने छतरपुर स्टेशन पहुंचकर स्टेशन मास्टर और वन विभाग को घटना की सूचना दी।

बुधवार सुबह वन विभाग और रेलवे के अधिकारी घटनास्थल पर पहुंचे। डीएफओ उमेश चंद्र तिवारी ने मौके का निरीक्षण कर अधिकारियों से जानकारी जुटाई। विशेषज्ञ पशु चिकित्सकों के पैनल ने आवश्यक औपचारिकताएं पूरी करने के बाद सुबह करीब 11:30 बजे हाथी के शव का पोस्टमार्टम किया। इसके बाद शव को घटनास्थल के पास ही दफना दिया गया। पोस्टमार्टम टीम में डॉ. राहुल सती, डॉ. हिमांशु पाठक, डॉ. दिव्या पाठक और डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के शुभांकर विश्वास शामिल रहे।

टक्कर से टूटा हाथी का दांत, वन विभाग ने शुरू की जांच

हादसे की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि टक्कर के दौरान हाथी का एक दांत टूटकर दूर जा गिरा। रेलवे प्रशासन ने सुरक्षा की दृष्टि से दांत को अपने कब्जे में लिया था, जिसे बुधवार को औपचारिक प्रक्रिया पूरी करने के बाद वन विभाग को सौंप दिया गया।

रुद्रपुर रेंज के एसडीओ अमित ग्वासीकोटी के मुताबिक, हादसे के समय हाथियों का झुंड रेलवे ट्रैक पार कर रहा था। झुंड के अन्य हाथी आगे निकल गए, जबकि एक हाथी ट्रेन की चपेट में आ गया। मृत हाथी के दोनों दांत सुरक्षित पाए जाने की जानकारी भी दी गई है।

उन्होंने बताया कि लोको पायलट के खिलाफ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज कर विधिक कार्रवाई की तैयारी की जा रही है। भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए संबंधित क्षेत्र में सेंसर आधारित चेतावनी प्रणाली लगाने के संबंध में रेलवे को पत्र लिखा जाएगा।

एक घंटे तक चिंघाड़ता रहा हाथियों का झुंड

हादसे के बाद घटनास्थल के पास मौजूद सैनिक फार्म के कर्मचारियों ने हाथियों के झुंड की बेचैनी को करीब से देखा। कर्मचारियों के अनुसार, हादसे के बाद झुंड लगभग एक घंटे तक जोर-जोर से चिंघाड़ता रहा। बाद में धीरे-धीरे शांत होकर वहां से चला गया। झुंड के आक्रामक होने की आशंका से आसपास मौजूद लोग डरे रहे, लेकिन किसी पर हमला नहीं हुआ।

यह दृश्य वन्यजीवों के जीवन से जुड़े उस दर्दनाक पहलू को भी सामने लाता है, जहां इंसानी गतिविधियों और प्राकृतिक आवासों के बीच बढ़ता टकराव बेजुबान जीवों के लिए जानलेवा बनता जा रहा है।

पानी और बांस का आकर्षण, लेकिन रास्ते में मौत का जाल

हाथियों की मौत का यह हादसा महज एक रेल दुर्घटना नहीं, बल्कि जंगलों में घटते प्राकृतिक संसाधनों और बाधित होते वन्यजीव गलियारों की समस्या की ओर भी इशारा करता है। हल्दी रोड स्टेशन के पीछे पंतनगर विश्वविद्यालय के कृषि वानिकी अनुसंधान केंद्र में फैला बांस का विशाल जंगल हाथियों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र है। बांस की पत्तियां उनका प्रिय भोजन हैं, जबकि कल्याणी, बैगुल, फुलवा और बेनी नदियों का पानी उन्हें अपनी ओर खींचता है।

लेकिन जंगल से पानी और भोजन की तलाश में निकलने वाले हाथियों के सामने रेलवे लाइनें जानलेवा बाधा बन जाती हैं। वन्यजीवों की आवाजाही वाले क्षेत्रों में पर्याप्त जल स्रोतों की उपलब्धता और सुरक्षित आवागमन के इंतजामों की कमी इस खतरे को और बढ़ाती है।

वन क्षेत्र में बने कई वाटर होल्स को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि कई स्थानों पर पर्याप्त जल स्रोत विकसित नहीं किए गए हैं और जहां निर्माण हुआ है, वहां पानी की उपलब्धता बनाए रखने के इंतजाम नाकाफी हैं। ऐसे में वन्यजीव आबादी और रेलवे ट्रैक की ओर रुख करने को मजबूर होते हैं।

इसी रेलखंड पर पहले भी जा चुकी हैं हाथियों की जानें

हल्दी रोड–छतरपुर रेलखंड पर हाथियों की मौत का यह पहला मामला नहीं है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 17 अप्रैल 2017 को घटनास्थल से लगभग 200 मीटर दूर ट्रेन की टक्कर से दो अवयस्क मादा हाथियों की मौत हो गई थी। इसके अलावा 27 मई 2018 को सीमैप के पास रेलवे ट्रैक पार करते समय एक मादा हाथी की भी जान चली गई थी।

देश में रेलवे ट्रैक पर हाथियों की मौत के सामने आए आंकड़े भी चिंता बढ़ाते हैं। खबर में उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में छह और वर्ष 2026 में अब तक आठ हाथियों की रेल हादसों में मौत दर्ज की गई है। ये आंकड़े रेलवे और वन विभाग के सामने वन्यजीव सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत को रेखांकित करते हैं।

हाथी कॉरिडोर पर अतिक्रमण, वन्यजीवों के सामने बढ़ता संकट

सड़कों, रेलवे लाइनों और अन्य विकास परियोजनाओं के विस्तार की रफ्तार ने हाथियों के पारंपरिक आवागमन मार्गों को प्रभावित किया है। मीडिया रिपोर्ट के हवाले से उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, उत्तराखंड में सड़क और रेलवे ट्रैक के कारण 25 हाथी कॉरिडोर प्रभावित हुए हैं। नेपाल से हरिद्वार तक फैले हाथियों के आवागमन मार्गों पर भी अतिक्रमण और विकास गतिविधियों का दबाव बढ़ा है।

टांडा जंगल कॉरिडोर में पांच तालाब और 12 मौसमी नाले होने के बावजूद पानी की कमी वन्यजीवों के लिए चुनौती बनी हुई है। जब जंगल के भीतर भोजन और पानी पर्याप्त नहीं मिलता, तो हाथियों का आबादी और रेलमार्गों की ओर बढ़ना स्वाभाविक हो जाता है। ऐसे में केवल हादसे के बाद कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं होगा; जरूरत उन कारणों को दूर करने की है, जो वन्यजीवों को जोखिम भरे रास्तों पर जाने के लिए मजबूर करते हैं।

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