उत्तराखंड की आयरन लेडी और गरीबों की अम्मा इंदिरा हृदेश 50 साल तक राजनीति में रही सक्रिय जानिए कैसा रहा उनका बेदाग़ राजनितिक सफर…

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हल्द्वानी : वरिष्ठ कोंग्रेसी नेता और नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदेश आज अचानक अपने चाहने वालों को छोड़कर इस दुनिया से चली गई.. उन्हें निधन की खबर के बाद उत्तराखंड के साथ साथ उनके गृह नगर हल्द्वानी में शोक की लहर है. इंदिरा हृदेश को गरीबों की मसीहा कहा जाता हैं उनके चाहने वाले उन्हें इंदिरा अम्मा कहकर पुकारते हैं.उनके निधन से चाहने वाले मायूस हैं. आज हम बात करते हैं इंदिरा हृदेश के राजनैतिक सफर की बात करते हैं कि कैसे वह गरीबों की मसीहा बनी.. कहा जाता है कि अगर किसी की कही सुनवाई नहीं होती तों उसकी सुनवाई इंदिरा अम्मा यानी इंदिरा हृदेश के यहाँ होती थी.. वह हमेशा गरीबों के हक़ के लिए लड़ी.. उन्हें आइरन लेडी ऑफ़ उत्तराखंड के नाम से पुकारा जाता है.

डॉ. इंदिरा हृदयेश उत्तर प्रदेश के समय से ही राजनीति में सक्रिय हो गईं थीं। वह उत्तर प्रदेश के समय में शिक्षक कोटे से विधान परिषद की सदस्य थीं। राज्य गठन के बाद जब हरीश रावत को कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था तब उन्होंने इस बात पर खुलकर नाराजगी जताई थी और स्वयं को कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष न बनाए जाने से काफी दिनों तक नाराज भी रहीं। 2002 में जब उत्तराखंड में पहले विधानसभा चुनाव हुए तब वह हल्द्वानी विधानसभा सीट से खड़ीं हुईं और भाजपा के कद्दावार नेता बंशीधर भगत को हरा दिया

इसके बाद उन्होंने राज्य सरकार में लोक निर्माण विभाग, सूचना प्रौद्योगिकी, संसदीय कार्य मंत्री जैसे अहम मंत्रालयों को संभाला। कहा जाता है कि एनडी तिवारी के सीएम रहते उस समय सरकार में उनको सीएम नंबर दो की हैसियत थी। हालांकि उन्होंने अपनी राजनीतिक पहचान बनाने के लिए विकास के कामों को चुना।.

उनके शासन के दौरान उनके विधानसभा क्षेत्र हल्द्वानी में ही नहीं बल्कि पूरे राज्य में सड़क निर्माण में उल्लेखनीय कार्य हुआ। लेकिन राज्य में हुए 2007 के विधानसभा चुनाव में वह हल्द्वानी विधानसभा सीट से भाजपा के नेता बंशीधर भगत से चुनाव हार गईं।

हालांकि इस चुनाव में उनकी हार का बड़ा कारण कांग्रेस नेता मनोज पाठक के निर्दलीय होकर चुनाव लड़ने को भी माना जाता है। उन्होंने कांग्रेस से जुड़े युवाओं के जमकर वोट काटे थे। इसके बाद एनडी तिवारी भी राज्य की राजनीति से दूर हो गए और आंध्र प्रदेश के राज्यपाल बना दिए गए।

1974 से 1980 तक उत्तर प्रदेश विधानसभा परिषद की सदस्य रहने के बाद इंदिरा हृदयेश दूसरी बार 1986 से 1992 तक उत्तर प्रदेश में एमएससी बनी, इसके बाद 1992 से 1998 तक एमएलसी रही और 1998 से 2000 तक एमएलसी रहने के बाद उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड अलग हो गया। उत्तराखंड अलग होने के बाद इंदिरा हृदयेश प्रदेश की लीडर आफ अपोजिशन के पद को संभाला।

उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2002 मे कांग्रेस की सरकार बनने के बाद इंदिरा हृदयेश को कैबिनेट मंत्री बनाया गया, संसदीय कार्य व महत्वपूर्ण विभाग उनके हाथों में रहे, 2012 से 2017 तक फिर हल्द्वानी से चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस सरकार में भारी-भरकम विभागों के साथ मंत्री बनी,

2017 में कांग्रेस चुनाव हार गई लेकिन विपरीत परिस्थितियों में भी इंदिरा हृदयेश हल्द्वानी सीट जितने में कामयाब रहीं और नेता प्रतिपक्ष के रूप में कांग्रेस पार्टी का दायित्व संभाल रही थी।

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