उत्तराखंड में बंदी की कगार पर कई कॉलेज..


हल्द्वानी – उत्तराखंड में बीएड कॉलेजों की हालत इन दिनों काफी चिंताजनक होती जा रही है। कभी प्रदेश में बीएड की पढ़ाई के लिए छात्रों की भारी भीड़ हुआ करती थी, लेकिन वक्त के साथ अब स्थिति बिल्कुल पलट चुकी है। हाल ये है कि सरकारी हो या निजी, सभी बीएड संस्थान छात्रों की कमी से जूझ रहे हैं।
बीते वर्षों में बीएड को प्राथमिक शिक्षक भर्ती की पात्रता में शामिल किया गया था, जिससे छात्रों की बड़ी तादाद ने इन संस्थानों में दाखिला लिया। रोजगार की संभावना के चलते बीएड पाठ्यक्रम तेजी से लोकप्रिय हुआ और प्रदेश भर में बड़ी संख्या में बीएड कॉलेज खुल गए। लेकिन अब परिदृश्य बदल गया है।
इस वर्ष भी बीएड को लेकर असमंजस
सरकार द्वारा प्राथमिक शिक्षक पद के लिए डीएलएड को अनिवार्य कर देने के बाद बीएड को लेकर छात्रों की रुचि तेजी से घट गई है। बीते वर्ष आयोजित बीएड संयुक्त प्रवेश परीक्षा में लगभग 6500 सीटें थीं, लेकिन इनमें से सिर्फ 3300 सीटों पर ही अभ्यर्थियों ने प्रवेश लिया। इस वर्ष भी बीएड को लेकर असमंजस की माहौल बना हुआ है। बीएड की घटती लोकप्रियता ने प्राईवेट बीएड कॉलेजों को सबसे ज्यादा चिंता में डाल दिया है।
सरकार और शिक्षा विभाग की ओर से भी इस दिशा में कोई खास दिलचस्पी नहीं ली जा रही है। हालांकि इस वर्ष सरकार ने बीएड की प्रवेश परीक्षा समाप्त कर दी।
समर्थ पोर्टल के ज़रिये प्रवेश और काउंसलिंग के माध्यम से बीएड अभ्यर्थियों के एडमिशन की बात सामने आ रही है, लेकिन इसे लेकर भी अभी तक कोई खास हलचल पाठ्यक्रम को लेकर दिखाई नहीं दे रही है। विगत वर्ष करीब-करीब सारे ही कॉलेजों में बीएड की सीटें रिक्त रह गयी थीं। कई कॉलेज तो ऐसे हैं, जिनमें गिनती के 10-20 अभ्यर्थियों ने ही एडमिशन लिया।
ऐसे में प्राईवेट कॉलेजों के सामने स्टाफ और ढांचे के खर्च पूरे करना मुश्किल हो रहा है और प्रबंधन लगातार नुकसान झेल रहे हैं। ऐसे में राज्य सरकार से मांग की जा रही है कि वह बीएड पाठ्यक्रम चलाने वाले संस्थानों को लेकर कोई ठोस नीति बनाए।
कॉलेज प्रबंधन का कहना है कि जब तक बीएड को फिर से शिक्षक भर्ती की पात्रता में नहीं जोड़ा जाएगा या इन डिग्रीधारकों के लिए कोई अन्य वैकल्पिक करियर अवसर सुनिश्चित नहीं किए जाएंगे, तब तक इन संस्थानों का संचालन मुश्किल होता जाएगा। स्थिति यह है कि कई निजी बीएड कॉलेज बंद होने की कगार पर हैं और भविष्य में सैकड़ों शिक्षकों व कर्मचारियों की नौकरियां खतरे में पड़ सकती हैं।



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