कोटद्वार बवाल मामला : हाईकोर्ट में दीपक की याचिका निस्तारित_कहा सोशल मीडिया से दूरी..

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उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने कोटद्वार के मामूली विवाद से उपजे बवाल में सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता मो.दीपक को झटका देते हुए याचिका को निस्तारित कर दिया है। लम्बी सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की एकलपीठ ने याचिकाकर्ता से जांच में पुलिस का सहयोग करने को कहा और याचीकाकर्ता को अनावश्यक रूप से सोशियल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर शामिल न होने की हिदायत दी है, ताकि जाँच प्रभावित न हो।


सुनवाई के दौरान याचीकाकर्ता दीपक कुमार उर्फ ‘मो.दीपक’ के अधिवक्ता ने न्यायालय को बताया कि उनकी ओर से दर्ज मुकदमे में पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं की। बकायदा अपनी तरफ से अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है। वो पुलिस को घटना में शामिल लोगों के नाम बता रहे हैं, लेकिन बावजूद इसके, मुक़दमा दर्ज नहीं किया। कहा कि वो भीड़ को शांत करने के लिए गए थे। पुलिस ने उल्टा उनके खिलाफ ही मुकदमा दर्ज कर दिया।

उनकी इस बात का विरोध करते हुए सरकार ने कहा गया कि घटना के वक्त ये वहाँ मौजूद थे। इन्होंने भीड़ के साथ धक्का मुक्की की और इसके बाद ही पुलिस ने इनके व 22 अन्य को चिन्हित कर मुकदमा मुकदमा दर्ज किया, जिसकी जांच चल रही है। कहा कि पुलिस ने घटना में शामिल पाँच लोगों के खिलाफ मुकदमे दर्ज कर लिए हैं। सभी पक्षो को सुनने के बाद न्यायालय ने याचीकाकर्ता को कोई राहत नहीं देते हुए याचिका को निस्तारित कर दिया है।


मामले के अनुसार, 26 जनवरी को कोटद्वार में बजरंग दल के कार्यकर्ता, एक मुस्लिम दुकानदार वकील अहमद की दुकान का नाम ‘बाबा’ रखने पर आपत्ति जता रहे थे। इस दौरान दीपक ने आगे आकर अहमद का समर्थन किया। सोशियल मीडिया पर वायरल वीडियो में दीपक ने दुकान का नाम ‘बाबा’ बदलने की मांग पर सवाल उठाते हुए कहा कि दुकान 30 साल से अधिक पुरानी है। जब भीड़ ने उनकी पहचान पूछी, तो उन्होंने कहा, “मेरा नाम मोहम्मद दीपक है”


यही वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ, जिसके बाद दीपक कुमार को लोगों का समर्थन मिलने लगा और उनके मुताबिक उन्हें 100 से 500 रुपये तक के छोटे-छोटे चंदे मिलने लगे।

इस घटना के बाद 28 जनवरी को दीपक कुमार और उनके सहयोगी के खिलाफ दुर्व्यवहार, मोबाइल फोन छीनने और आपराधिक धमकी देने के आरोप में मुकदमा दर्ज किया गया। दीपक कुमार ने उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल कर मुकदमा निरस्त करने, परिवार की सुरक्षा और संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच की मांग की गयी। फिलहाल उन्हें कोई राहत नहीं मिली है।

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